हंस वह बनता है जो सदा ज्ञान रत्न चुगता है – दादी जानकी

दादीजी ने कहा – समय भी उसी का साथ देता है जो व्यर्थ बातों के चिंतन से फ्री रहता है

नवयुग टाइम्स के जीवन मंत्र के इस कॉलम में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। इस कॉलम के अन्तर्गत हम ब्रह्माकुमारी संस्था की मुख्य प्रशासिका दादी जानकी जी अनमोल वचनों को सुनेंगे, पढ़ेंगे और उसे जीवन में अपनाएंगे।


ऊंचे ते ऊंचा भगवान वो न सिर्फ पिता बनकर के हमारा पालनहार बना है बल्कि मां बनके, टीचर बनके इतनी मीठी-मीठी शिक्षायें देकर हमारा इतना शृंगार किया हैं लेकिन परचिंतन सेकण्ड में शृंगार को बिगाड़ देता है। अब समय बदल गया है, परन्तु हम पास्ट को छोड़ते नहीं हैं तो और भी हमको छोड़ते नहीं हैं। हम परचिंतन में जाकर अपना समय व्यर्थ गंवा देते हैं। हरेक अपना पार्ट बजा रहा है लेकिन हमारी बुद्घि उस तरफ चली जाती है। इधर-उधर देखना तो कौवे का काम है। वो बिचारा हंस कैसे बनेगा? हंस वह बनता है जो सदा ज्ञान रत्न चुगता है। जिसको स्वच्छ साफ बनना है वो इधर-उधर नहीं देखता है। उसे ज्ञान रत्नों का बहुत कदर होता है। ज्ञान रत्न हमको पारस बुद्घि बना रहे हैं। जो व्यर्थ बातों के चिंतन व वर्णन से फ्री रहता है उसे समय भी साथ देता है। भगवान भी उनका साथी बन जाता है। यह जो कहावत है कि शेरनी के दूध के लिए सोने का बर्तन चाहिए तो बाबा के भी इतने ऊंचे ज्ञान के लिए बुद्घि बिल्कुल स्वच्छ चाहिए। जरा सा भी किचड़ा हुआ तो ज्ञान बुद्घि में टिकेगा ही नहीं। ज्ञान का सिमरण करने के बिना वर्णन करना तो तोता भी जानता है। तो सिमरण करके, उसे चिन्तन करके व्यर्थ से फ्री हो जाएं।

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