ब्रह्माकुमार करूणा भाई, मल्टी मीडिया चीफ, ब्रह्माकुमारी

कोरोना से बदलता युग…

  • जिस पैसे के लिए इंसान जीवनभर दौड़ता रहता है आज वो पैसा जीवन बचाने के काम नहीं आ रहा

  • महामारी ने एक बार फिर लोगों का ध्यान साफ-सफाई और भारतीय संस्कृति की ओर खींचा है

  • पर्यावरण को एक हद तक प्रदूषण से मुक्ति मिल गई है और प्रकृति अपने पुराने स्वरूप में लौट आई है

  • अपने आप में व्यस्त रहने वाली दुनिया के लिए ये बदलाव एक युग परिवर्तन की तरफ संकेत है

लेखक : ब्रह्माकुमार करूणा भाई, अध्यक्ष, मल्टी मीडिया, ब्रह्माकुमारीज

कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए 24 मार्च के बाद से ही पूरे देश में लॉकडाउन जारी है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी में आज हर कोई असुरक्षित महसूस कर रहा है। लोगों को घर में ही स्वयं को कैद होने और अपनों से दूर रहने को विवश होना पड़ रहा है। अब लोगों को यह समझ में आ गया होगा कि कोरोना वायरस का कोई इलाज नहीं है। और इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है सोशल डिस्टेंसिंग माना एक-दूसरे से सामाजिक दूरी बनाकर रखना। पूरी दुनिया में किए गये अलग-अलग वैज्ञानिक शोध यही कहते हैं कि ये दूरी हमें आने वाले कई वर्षों तक बनाकर रखनी होगी। ये वायरस हमारे सभी सामाजिक पैमानों को हमेशा के लिए बदलकर रख देगा। कोरोना वायरस के संकट ने हमें यही सिखाया है – हमें पृथ्वी और प्रकृति का दोहन नहीं बल्कि उसका संरक्षण करना है। लेकिन क्या यह संकट काल युग परिवर्तन की तरफ कोई संकेत तो नहीं कर रहा है। इस दौरान प्रकृति में आये कुछ बदलाव तो यही कहानी कहते हैं। जिनके बारे में हमारे प्राचीन शास्त्रों में कहा गया है। कलियुग के कल-कारखाने अर्थव्यवस्था के लिए तो जरूरी हैं लेकिन ये प्रदूषण की भी सबसे बड़ी वजह है। आज कारखाने बंद हैं और पर्यावरण को एक हद तक प्रदूषण से मुक्ति मिल गई है और प्रकृति अपने पुराने स्वरूप में लौट आई है। लॉकडाउन में लोगों ने पहली बार प्रकृति को इतनी नजदीक से देखा और उसकी अप्रतिम सुंदरता का अहसास किया है।
पैसे और धन-दौलत को लेकर भी लोगों की सोच अब बदल रही है। जिस पैसे के लिए इंसान जीवनभर दौड़ता रहता है आज वो पैसा जीवन बचाने के काम नहीं आ रहा। सतयुग के बारे में कहा जाता है कि वहां लोग एक-दूसरे को सहयोग देते हैं। जिससे वहां सुख-शांति का साम्राज्य होता है। वहां अगर किसी को कोई धन रखा हुआ मिल जाता था तो वहां ईमानदारी इस हद तक होती थी कि लोग उसे हाथ नहीं लगाते थे। आज भी वैसा ही देखने को मिल रहा है। सड़क पर नोट आपके सामने पड़ा है लेकिन आप उसे हाथ नहीं लगा सकते। इस तरह से लोगों को यह एहसास हो गया है कि कोरोना वायरस जिस तरह से अमीर-गरीब दोनों को बराबरी से मार रहा है उसमें पैसा आपकी जान नहीं बचा सकता है।
एक जमाना था जब घर पर आये मेहमानों को सबसे पहले हाथ और पैर धुलवाये जाते थे। खाना खाने से पहले मां कहती थी बेटा हाथ धो लो। महामारी ने एक बार फिर लोगों का ध्यान साफ-सफाई और भारतीय संस्कृति की तरफ आकर्षित किया है। इस महामारी ने लोगों का ध्यान शाकाहार की ओर खींचा है। ये भी एक बदलाव है। भारतीय संस्कृति में दूसरों की मदद करना सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। इस संकट की घड़ी में बड़ी संख्या में लोग एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। आपको दिन भर सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरे मिलती होगी जिसमें कोई खाना खिला रहा है तो कोई किसी और तरीके से किसी की मदद कर रहा है। भारतीय संस्कृति के सम्बन्ध में कहा जाता है कि नेकी कर दरिया में डाल पर उसे सोशल मीडिया पर डालने से आपको बचना चाहिए। इस महामारी से पहले लोगों को ऐसा लगता था मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे और चर्च जाये बगैर हम भगवान की पूजा-पाठ नहीं कर सकते हैं, प्रार्थना नहीं कर सकते हैं। लेकिन इस संकट की घड़ी ने लोगों को बता दिया है कि आप चाहे तो अपने मन को ही मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरूद्वारा बना सकते हैं। प्रार्थना के लिए सिर्फ एक निर्मल मन चाहिए, इसके लिए जगह कोई खास मायने नहीं रखती है।
पुराणों में कहा गया है कि जब कलियुग समाप्त होगा तब गंगा जैसी पवित्र नदी वापिस स्वर्ग चली जायेगी। कलियुग के समाप्त होने में अभी कितने वर्ष बाकी हैं ये तो हम नहीं जानते। लेकिन लॉकडाउन की वजह से देश भर की नदियां प्रदूषण से मुक्त होने लगी है। इस महामारी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है मृत्यु और महामारियां अमीर-गरीब, उंच-नीच को देखकर कभी भेदभाव नहीं करती। मृत्यु के सत्य ने सारे भेदभाव समाप्त कर दिये हैं। यानि इस महामहारी ने दुनिया के तमाम लोगों को बराबरी पर लाकर रख दिया है। इस संकट ने हमें बता दिया है कि हमें अपनी जरूरते सीमित करने की आवश्यकता है।
कोरोना वायरस से मिली प्रेरणा का यह अर्थ नहीं है कि आप लॉकडाउन खुलने के बाद पुराने ढर्रे पर लौट जायेंं। ये संकट काल आपके जीवन में सकारात्मक बदलाव तभी लायेगा जब आप इसे एक कैद की तरह नहीं बल्कि एक करिश्मा की तरह देखेंगे। यह एक ऐसा करिश्मा है जो आपके जीवन को पहाड़ की तरह मजबूत, सागर की तरह शांत और आसमान की तरह विशाल बना सकता है। अपने आप में व्यस्त रहने वाली दुनिया के लिए ये बदलाव एक युग परिवर्तन की तरफ संकेत है।

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